बंधन एक रेत की तरह होती है

 बंधन  एक रेत की तरह होती है -2,
हवा के रुख से जाने किधर  चल देती है 
कुछ दूर चल के जाने क्यों  ठहर जाती है 
एक नए बंधन   में खुद को फिर से बांध  लेती है 
पानी की बोछार  से  कुछ नए बंधन बन लेती है 
तेज़  धूप में  जाने फिर  क्यों टूट जाती है 
नए साथ ढूढने  को फिर से निकल जाती है 
बंधने की कोशिश में और बिखरती चली जाती है 
नए बंधन की आस में हर बार बिखर जाती है 
बंधन  एक रेत की तरह होती है-2 ,
हवा के रुख से जाने किधर  चल देती है 
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शिवेन्द्र  प्रकाश  सुमन
02/06/2011

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