देखता था हर रोज उसे -2
देखते हुये बरसतो को ।
परा था अपनी जगह पे
पर निहरता था वो बरसतो को ।
मन मे कुछः हुलास थे उसके
पर जाने किस बात से डरता था वो ।
सरक के किनारे बेठा-बेठा -२
हर किसी को निहरता था वो ।
सायद छत्री मिलजाये उसे
इस आश मे सब् को पुकारता था वो ।
भिगा था तन उसका -2
और भिग गया था वो ।
भीगोया था नही बारिश ने उसे
किस्मत ने उसे भीगोया था ।
चादर कि जगह -२
सुत (बोरा) लपेटे मैने उसे पाया था ।
देखता था हर रोज उसे -2
देखते हुये बरसतो को ।

0 Comments