हर बार वो आपने बात से मुकर जाती है ,
कुछ कहती है फिर हस क ताल जाती है ,
मह्स्गुल है वो खुद में इतना की हमने भूल जाती है,
मह्स्गुल हूँ मै उनमे इतना की खुद को भूल जाता हूँ,
उनकी एक हसी के आगे आपने होस गवा आता हूँ ,
होस आते ही आती है आँखों से नमी -२
पर पोछ कर उन्हें उनके लिए खुस हो जाता हूँ
ना मिलेंगे वो हमें जान कर खुस रहता हूँ ,
पर हर मोर पर मिलेंगे हम इस बात से खुद को सकूँ दिलाता हूँ,
जीवन की सचे को खुद से छुपा कर गम को पि जाता हूँ ,
उनकी खातिर खुद को मै खुद से हर बार जुदा पाता हूँ ,
हर बार जुदा पाता हूँ -२
फिर भी जाने क्या सोच कर मै हमेशा खुस रह पाता हूँ,
शिवेंद्र प्रकाश सुमन
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