एक रिश्ता अजीब देखा

  कल एक रिश्ता अजीब देखा -----२ 
        जो गिरे है अपनी नज़रो में ---२ 
उन्हें रिश्तो की आर में खुद को बेचते देखा ।
बनाने  अपनी पहचान में ---२ 
         हर रिश्तों को बेचते देखा ,
भूल  के हर एक पवित्र रिश्ता ---२ 
        रिश्तों को नीलम करते देखा । 

  कल एक रिश्ता अजीब देखा -----२ 

जो जी रहे हैं रिश्तों को टुकड़ो में ---२ 
       उन्हें शान से बिखरते देखा ,
दो छन के लिये ही सही ---२ 
      बूत खरा बेनक़ाब होते देखा ,
हर एक रिश्तों को धूल की तरह बिखरते देखा । 

  कल एक रिश्ता अजीब देखा -----
  कल एक रिश्ता अजीब देखा -----

शिवेन्द्र प्रकाश सुमन

29/06/2014