बंद पलकों में एक तस्विर बनी थी,
कैद करना चाहा था आँखों में .......2
पर बोझिल आँखों को होस कहा थी ।
मदहोस था उनके नशे में ....2
जो छाया बन के आँखों में पारी थी ।
शीत की धुप सी कोमल थी वो ,
वशंत की बहरा सी मनचली थी वो,
गंगा की धर सी निर्मल थी वो ,
स्वेत आकश सी निछल थी वो,
पानी की बूंदों सी पवित्र थी वो।
बंद पलकों में जो तस्विर बनी थी
शायद इस दुनिया से परे थी वो .......
इस दुनिया से पारी थी वो .......2
शिवेन्द्र प्रकाश सुमन
12/10/2012
+91-9755938443

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