शिकवा

 शिकवा

एक रात बड़ी सुहानी थी ... 2

      बातों की कहानी थी,

ना वक़्त की थी कमी ,

    न नींद को आंखों में आनी थी।

हर बात की अपनी ही कहानी थी,

     होठों की मुस्कान टाइपिंग से भी समझ आती थी।


फिर न जानें क्या हुआ......2

       सब यूं ही रुक सा गया।

शब्दों की जल के ऊपर एक परत सी चढ़ गई,

       होठों की मुस्कान जाने कहाँ गुम गए।

हम बुरे हैं ये मानते हैं,

     हम बिखरे हैं ये जानते हैं,

पर एक पल में सब छोड़ जाना..

    एक पल में यूं रूठ जाना ...

ये खता हम उनकी ही मानते हैं ।

शिकवा को शब्दों से दूर किया जाता है..2

अपनों को दूर करके गिला -शिकवा नहीं मिटाई जाती।


शिवेंद्र प्रकाश सुमन

02-06-2021

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