उन्हें लगता है कि मैं उन्हें सहारा बना रहा हूँ,
मुझे लगता है कि मैं अपना ही सहारा मज़बूत कर रहा हूँ।
मान लेता हूँ नादानी है मेरी –
अपनी बातें तुम पर थोपने की कोशिश।
कुछ पल और ठहर गया हूँ बस,
फिर ये नादानी भी नहीं रहेगी।
तुम्हें आज़ादी पसंद है — मिलेगी, पूरी मिलेगी,
साथ रहना तुम्हें भी अच्छा लगता है, मुझे भी।
पर हालात से मुकरकर लड़ना
उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है।
थोड़ा सा सब्र बचा है अब भी,
बस टूटने का इंतज़ार है।
तब शायद तुम सचमुच आज़ाद होगी,
और मैं अपने सपनों में खो जाऊँगा।
जब तक टिक पाया हूँ, तब तक रुक गया हूँ,
तब तक ही झुक पाया हूँ।
जिस दिन सहारा मेरा अपना होगा —
उसी दिन मैं सच में, सिर्फ अपना हो जाऊँगा।
शिवेंद्र प्रकाश सुमन
30-12-2025
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