कभी मौजो में ढूंढ़ता हूँ उसे ....


कभी  मौजो  में  ढूंढ़ता हूँ  उसे  ,
       कभी  बहारो  में  ढूंढ़ता  हूँ  उसे  ,
          समाए  है  जो  मेरे  रोम -रोम  में ,
                हर  जगह  ढूंढ़ता  हूँ  उसे |
कुछ  इस  कद्र  दूर  हुए  है  वो  मुझसे  
       हर   जरे  - जरे  में  ढूढ़ता  हूँ  उसे ,
         इन  मौसम  से , इन फिजाओ  से  हर  बार  पूछता  हूँ  उसे  
            वो  बेबफा  हो  गए  है  हर  बार  वो  कहते  है  मुझे |
यकीन  है  खुद  के   प्यार पर   कुछ  इतना  ....2
    इन  फिजाओ  की  हर  बात  झूटी  लगती  है  मुझे ,  
       जिनकी  हर  एक  अदा  पर  झुमने  को  दिल  करता  था  
             आज  हर  एक  अदा  उनकी  बुरी  लगती  है  मुझे   |
किस  पर  यकीन  करू  प्यार   पर  या  इन  फिजाओ  पर  
    अब  तो  दोनों  ही  बुरे  लगते  है  मुझे  | 
खुद  को  भूल  जाऊ   या  प्यार  को  
  जिंदगी  के  सफ़र  में  दोनों  अधूरे  लगते  है  मुझे 
अब  किससे  पुछू  ,केसे  पुछू  .......2
     कहा     जाऊ   किसे  धुधु.....2
       जाने  किस  उधेर  बुन  में  उलझा  हूँ  मै ..
                   उलझा  हूँ  मै .........
शिवेंद्र  प्रकाश  सुमन 
04|05|2012
+91-9755938443

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